नई दिल्ली
देश के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं और मानसिक तनाव के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स (NTF) ने चिंता जताई है। टास्क फोर्स का कहना है कि स्टूडेंट आत्महत्या को केवल मानसिक स्वास्थ्य की समस्या मानना सही नहीं होगा, क्योंकि इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत कारण भी जिम्मेदार हैं।
पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट की अध्यक्षता वाली इस 10 सदस्यीय समिति ने देश के 10 राज्यों के 30 से ज्यादा शिक्षण संस्थानों का दौरा किया है। इनमें IIT दिल्ली, एम्स दिल्ली, जेएनयू और जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसे संस्थान भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने समिति को अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए 31 अक्टूबर तक का समय दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने छात्र आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों को “बेहद चिंताजनक” बताया है। अदालत के अनुसार, वर्ष 2022 में देश में 13 हजार से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की थी, जो एक गंभीर सामाजिक चुनौती है।
सर्वे में सामने आईं बड़ी बातें
टास्क फोर्स के सर्वे में 2.4 लाख से अधिक छात्रों ने हिस्सा लिया। इनमें 34 प्रतिशत छात्रों ने खुद को कैंपस में अलग-थलग महसूस करने की बात कही, जबकि केवल 56 प्रतिशत छात्रों को अपने संस्थान के प्रशासन पर भरोसा है कि वह उनकी समस्याओं का निष्पक्ष समाधान करेगा।
तनाव के कई कारण
रिपोर्ट के अनुसार, शैक्षणिक दबाव, भेदभाव, आर्थिक कठिनाइयां, सामाजिक अलगाव, उत्पीड़न और संस्थागत सहयोग की कमी छात्रों में तनाव बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं। टास्क फोर्स ने पाया कि छात्र संकट केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि संरचनात्मक समस्या भी है।
मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
सर्वे में शामिल 70 प्रतिशत से अधिक संस्थानों में पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ नहीं हैं। वहीं, बहुत कम संस्थानों के पास आत्महत्या रोकथाम के लिए औपचारिक प्रोटोकॉल मौजूद हैं। अंतिम रिपोर्ट में जवाबदेही बढ़ाने, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और छात्रों के लिए सुरक्षित व समावेशी माहौल बनाने की सिफारिशें की जा सकती हैं।

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