नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को भीमा कोरेगांव मामले में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत आरोपी कार्यकर्ता और कवि पी वरवर राव पर लगाई गई मेडिकल जमानत की शर्त में बदलाव करने की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया. इस शर्त के तहत, अगर उन्हें ग्रेटर मुंबई क्षेत्र छोड़ना है, तो उन्हें ट्रायल कोर्ट से पूर्व अनुमति लेनी होगी. जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर की दलीलें सुनने के बाद याचिका को खारिज कर दिया गया.
ग्रोवर ने दलील दी कि राव चार साल से जमानत पर हैं, लेकिन उनकी सेहत बिगड़ती जा रही है. पहले उनकी पत्नी उनकी देखभाल करती थीं, लेकिन अब वह हैदराबाद चली गई हैं इसलिए उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है. वरिष्ठ वकील ने कहा, ‘आज भी वह चक्कर आने से गिर पड़े. राव की पेंशन 50,000 रुपए है, लेकिन उन्हें हर महीने 76,000 रुपए खर्च करने पड़ते हैं. तेलंगाना में उन्हें मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं, लेकिन ग्रेटर मुंबई में उन्हें हर बार स्वास्थ्य सुविधाओं पर पैसा खर्च करना पड़ता है.’
जस्टिस माहेश्वरी ने असहमति जताते हुए कहा, ‘सरकार उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखेगी, अन्यथा उसी कोर्ट में जाएं, हमें इसमें कोई रुचि नहीं है.’ वहीं, ग्रोवर ने यह भी बताया कि मामले की कार्यवाही सीआरपीसी की धारा 207 के चरण में है और मुकदमा जल्द पूरा होने की संभावना नहीं है. उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि राव को बाद में आवेदन करने की अनुमति दी जाए, लेकिन कोर्ट ने आदेश में ऐसी कोई बात दर्ज करने से इनकार कर दिया.
साल 2022 में मिली थी जमानत
दरअसल, अगस्त 2022 में जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने राव को उनकी उम्र, स्वास्थ्य स्थितियों और उनके ओर से बिताई गई 2.5 साल की वास्तविक हिरासत अवधि को ध्यान में रखते हुए मेडिकल आधार पर जमानत दी थी. इसके अलावा, पीठ ने यह भी कहा था कि मामले में मुकदमा शुरू नहीं हुआ है और आरोपपत्र दायर होने के बावजूद आरोप भी तय नहीं किए गए हैं. यह आदेश दिया गया था कि राव मुंबई स्थित विशेष एनआईए अदालत की स्पष्ट अनुमति के बिना ग्रेटर मुंबई क्षेत्र से बाहर नहीं जाएंगे और किसी भी तरह से अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करेंगे, न ही किसी गवाह से संपर्क करेंगे और न ही जांच को प्रभावित करने का प्रयास करेंगे.

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