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भोपाल
लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने कहा कि नवाचार तभी सार्थक है, जब वह प्रयोगशाला से निकलकर वास्तविक निर्माण स्थल तक पहुंचे और मैदानी स्तर पर प्रमाणित परिणाम दे। नवीन तकनीकों को पहले पायलट परियोजनाओं एवं परीक्षण खंडों में परखा जाए तथा सफल परिणाम मिलने के बाद उन्हें व्यापक स्तर पर अपनाया जाए। वैज्ञानिक अनुसंधान केवल दस्तावेजों तक सीमित न रहे, बल्कि उसका सीधा लाभ अधोसंरचना परियोजनाओं और आमजन तक पहुंचे।
मंत्री सिंह बुधवार को सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली की प्लेटिनम जुबली के अवसर पर सीएसआईआर-एएमपीआरआई, भोपाल में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। कार्यशाला का विषय “सतत अधोसंरचना के लिए नवोन्मेषी सामग्री एवं उन्नत कंपोजिट” था। इसका संयुक्त आयोजन सीएसआईआर-सीआरआरआई, नई दिल्ली और सीएसआईआर-एएमपीआरआई, भोपाल द्वारा किया गया।
मंत्री सिंह ने सड़क एवं परिवहन अधोसंरचना के क्षेत्र में 75 वर्षों की उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सीएसआईआर-सीआरआरआई को बधाई देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश के अधोसंरचना क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। प्रधानमंत्री का विजन है कि अधोसंरचना का विकास तेज गति से हो, लेकिन निर्माण टिकाऊ, गुणवत्तापूर्ण, सुरक्षित और दीर्घकालिक भी हो। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश भी नवीन तकनीकों एवं नवाचारों को अपनाते हुए तेजी से आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि बढ़ते यातायात, भारी वाहनों, सीमित प्राकृतिक संसाधनों और बदलती जलवायु के बीच हमारा लक्ष्य केवल अधिक सड़कें बनाना नहीं, बल्कि सुरक्षित, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल अधोसंरचना विकसित करना होना चाहिए। इसके लिए वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को स्थानीय संसाधनों पर आधारित कम लागत वाली स्वदेशी तकनीकें विकसित करनी होंगी। नई तकनीकें गुणवत्तापूर्ण होने के साथ व्यावहारिक और किफायती भी होनी चाहिए। पराली सहित अनुपयोगी सामग्रियों का अधोसंरचना निर्माण में उपयोग कर पर्यावरणीय समस्याओं को उपयोगी संसाधनों में बदला जा सकता है।
मंत्री सिंह ने कहा कि प्रयोगशालाओं में अच्छे परिणाम देने वाली तकनीकें कई बार अधिक लागत, सामग्री की अनुपलब्धता और व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण निर्माण स्थल तक नहीं पहुंच पातीं। वैज्ञानिक संस्थानों, इंजीनियरों और निर्माण एजेंसियों को मिलकर इन बाधाओं का समाधान करना होगा। सीमित संसाधनों में अधिक मजबूत एवं लंबे समय तक चलने वाली सड़कें बनाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि लोक निर्माण विभाग केवल सड़क, भवन और पुलों का निर्माण नहीं करता, बल्कि इनके माध्यम से नागरिकों के जीवन को सरल, सुरक्षित एवं बेहतर बनाता है। इसी सोच के साथ विभाग ने “लोक निर्माण से लोक कल्याण” को अपना ध्येय वाक्य बनाया है।
मंत्री सिंह ने लोकपथ ऐप-2 की जानकारी देते हुए बताया कि नागरिक सड़क पर गड्ढे अथवा क्षति का जियो-टैग्ड फोटो ऐप पर अपलोड कर सकते हैं। शिकायत के निराकरण की समय-सीमा सात दिन से घटाकर चार दिन कर दी गई है। ऐप वैकल्पिक मार्ग, दूरी, टोल टैक्स, अस्पताल और अन्य सुविधाओं की जानकारी देने के साथ ब्लैक स्पॉट से लगभग 500 मीटर पहले वाहन चालक को सतर्क भी करता है।
उन्होंने बताया कि सड़क निर्माण को जल-संरक्षण से जोड़ते हुए सड़कों के किनारे निश्चित दूरी पर रिचार्ज बोर बनाए जाएंगे। भास्कराचार्य संस्थान के सहयोग से इनके लिए उपयुक्त स्थानों का वैज्ञानिक निर्धारण किया जा रहा है। प्रत्येक रिचार्ज बोर पर लगभग 30 से 35 हजार रुपये की लागत आएगी।
सड़क निर्माण के दौरान निकलने वाली मिट्टी का उपयोग करते हुए प्रदेश में अब तक लगभग 700 से अधिक लोक कल्याण सरोवर बनाए जा चुके हैं। विभाग दो करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले निर्माण कार्यों को जल-संरक्षण संरचनाओं से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसी क्रम में नए पुलों की डिजाइन में रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली को भी शामिल किया जाएगा, जिससे बारिश का पानी व्यर्थ बहने के बजाय भूजल पुनर्भरण में उपयोग हो सके। अधोसंरचना का विकास पर्यावरण के साथ समन्वय बनाकर किया जाना चाहिए।
मंत्री सिंह ने बताया कि सड़क, पुल और भवन परियोजनाओं की समय-सीमा वैज्ञानिक आधार पर निर्धारित करने के लिए विशेष सॉफ्टवेयर भी विकसित किया जा रहा है। परियोजना की लंबाई, लागत, स्थल की परिस्थितियों, मानव संसाधन और मशीनरी की जानकारी दर्ज करने पर सॉफ्टवेयर कार्य पूर्ण होने की व्यावहारिक समय-सीमा निर्धारित करेगा।
उन्होंने सीएसआईआर-सीआरआरआई, सीएसआईआर-एएमपीआरआई, मध्यप्रदेश लोक निर्माण विभाग, एमपीआरडीसी, भारतीय रेलवे, शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग जगत के बीच मजबूत समन्वय पर जोर देते हुए कहा कि प्रत्येक कार्यशाला से ठोस एवं सकारात्मक परिणाम निकलना चाहिए। प्रस्तुत विचारों और तकनीकों को समयबद्ध कार्ययोजना में परिवर्तित कर प्रदेश और देश के हित में उपयोग किया जाए।
एमपीआरडीसी के प्रबंध संचालक भरत यादव ने बताया कि लोक निर्माण विभाग एवं एमपीआरडीसी द्वारा लगभग 50 हजार करोड़ रुपये के सड़क कार्य किए जा रहे हैं। नवीन तकनीकों को वैज्ञानिक परीक्षण और पायलट प्रयोग में सफल होने के बाद अपनाया जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसंधान और अभियंताओं के मैदानी अनुभव से टिकाऊ, सुरक्षित एवं किफायती सड़कें विकसित की जाएंगी।
सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. एन. कलैसेल्वी ने ऑनलाइन संबोधित करते हुए कहा कि सीएसआईआर की 37 प्रयोगशालाएं समन्वय के साथ जनोपयोगी तकनीकें विकसित कर रही हैं। सीएसआईआर-सीआरआरआई और सीएसआईआर-एएमपीआरआई द्वारा विकसित स्टील स्लैग, फ्लाई ऐश तथा अपशिष्ट आधारित सतत सड़क तकनीकें मध्यप्रदेश की अधोसंरचना के लिए उपयोगी सिद्ध होंगी।
तीन तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव
कार्यशाला के प्रथम तकनीकी सत्र “राजमार्ग अधोसंरचना के लिए नवोन्मेषी निर्माण एवं पुनर्वास तकनीक” में सॉइल नेलिंग के साथ बॉक्स-जैकिंग तकनीक तथा सड़क एवं रेलवे अंडरपास निर्माण पर चर्चा हुई। राजमार्ग जियो-स्ट्रक्चर के पुनर्वास और मैदानी अध्ययन भी प्रस्तुत किए गए।
द्वितीय तकनीकी सत्र “सतत अधोसंरचना के लिए सामग्री एवं पुनर्चक्रण तकनीक” में राजमार्ग निर्माण में अपशिष्ट सामग्री के उपयोग, विस्तारशील मिट्टी के स्थिरीकरण के लिए बायो-स्टिम्युलेटेड कैल्साइट प्रिसिपिटेशन तथा फुल डेप्थ रिक्लेमेशन के सिद्धांत, व्यवहार एवं उपयोग पर विशेषज्ञों ने विचार रखे।
तृतीय तकनीकी सत्र “अधोसंरचना में उन्नत सामग्री एवं कंपोजिट का उपयोग” में फ्लाई ऐश आधारित जियोपॉलिमर कंक्रीट, संसाधन-कुशल जियोपॉलिमर कंक्रीट मिक्स डिजाइन, प्राकृतिक फाइबर आधारित कंपोजिट, टिकाऊ डामर सड़कों के लिए सिसल फाइबर सुदृढ़ीकरण तथा पुलों की सुपर-स्ट्रक्चर में फाइबर रीइन्फोर्स्ड पॉलिमर कंपोजिट के उपयोग पर तकनीकी प्रस्तुतियां दी गईं।
कार्यशाला के समापन सत्र में “राजमार्ग परियोजनाओं में नवोन्मेषी सामग्री एवं तकनीकों को अपनाने की कार्ययोजना” विषय पर पैनल चर्चा हुई। इसमें नई तकनीकों को लोक निर्माण विभाग की परियोजनाओं में चरणबद्ध रूप से अपनाने, परीक्षण खंड तैयार करने तथा उद्योग एवं अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से पायलट परियोजनाएं विकसित करने पर विचार-विमर्श किया गया।
कार्यशाला में निदेशक सीएसआईआर-सीआरआरआई डॉ. चालुमुरी रवि शेखर, निदेशक सीएसआईआर-एएमपीआरआई डॉ. थल्लाडा भास्कर, एमपीआरडीसी के प्रबंध संचालक भरत यादव, इंजीनियर-इन-चीफ आर.एल. वर्मा सहित वैज्ञानिक, अभियंता तथा रेलवे एवं उद्योग जगत के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

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