बॉम्बे
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास किसी भी बकाएदार के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर जारी करने का अधिकार नहीं है। विराज शाह बनाम भारत संघ एवं अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जीएस पटेल और जस्टिस माधव जामदार की खंडपीठ ने कहा कि केंद्र सरकार के कार्यालय ज्ञापन (OM) के तहत सार्वजनिक बैंकों को भारतीय नागरिकों या विदेशियों के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर (LOC) जारी करने की शक्ति नहीं है। बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक, खंडपीठ ने ये फैसला सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा कर्जदारों/ बकाएदारों को विदेश यात्रा से रोकने के लिए जारी लुक आउट सर्कुलर्स को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनाया है। हालांकि, मामले की सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के कार्यालय ज्ञापन संविधान के दायरे से बाहर नहीं हैं लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रबंधकों को लुक आउट सर्कुलर जारी करने की शक्ति देने का अधिकार मनमाना है।
इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अनुरोध पर जारी किए गए सभी लुक आउट सर्कुलर को रद्द कर दिया। हालाँकि, खंडपीठ ने ये स्पष्ट किया कि दो जजों वाली बेंच द्वारा पारित आदेश किसी भी ट्रिब्यूनल या आपराधिक अदालत द्वारा जारी किए गए ऐसे किसी भी मौजूदा आदेश को प्रभावित नहीं करेगा, जो ऐसे व्यक्तियों को विदेश यात्रा से रोकता है।
बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के आव्रजन ब्यूरो द्वारा जारी किए गए ऐसे लुक आउट सर्कुलर किसी भी एयरपोर्ट या बंदरगाह पर ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को आव्रजन अधिकारियों द्वारा भारत से बाहर जाने से रोकने की अनुमति देता है, जिनके खिलाफ सर्कुलर जारी किया गया है। पहला लुक आउट सर्कुलर 27 अक्टूबर 2010 को जारी किया गया था। इसके बाद इसमें समय-समय पर संशोधन होते रहे हैं।
ऐसा ही एक संशोधन सितंबर 2018 में किया गया था, जिसमें "भारत के आर्थिक हित" के मद्देनजर लुक आउट सर्कुलर जारी करने का एक नया आधार पेश किया गया था। इसके तहत ऐसे किसी भी शख्स को विदेश यात्रा करने से रोकने का प्रावधान है, जिसके देश छोड़ने से देश के आर्थिक हितों पर बुरा असर पड़ सकता है।

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