अग्निवीरों को बड़ी राहत! 18 हजार जवानों का सेवाकाल 2 साल बढ़ा, स्थायी नौकरी का रास्ता खुला

Exposetodaynews:

नई दिल्ली

अग्निपथ योजना में बड़ा बदलाव किया गया है। चार साल की सेवा पूरी करने के बाद बाहर होने वाले 75 प्रतिशत अग्निवीरों को अब दो साल का अतिरिक्त कार्यकाल मिलेगा। इस दौरान उन्हें बेहतर वेतन और सेवा निधि में सरकार की ओर से ज्यादा योगदान भी मिलेगा। हालांकि, नियमित सैनिक बनने का रास्ता अभी भी चयन प्रक्रिया से ही होकर गुजरेगा। आखिर इस फैसले से अग्निवीरों को क्या फायदा होगा और सेना की भर्ती व्यवस्था में क्या बदलेगा? समझते हैं।

दिवाली से पहले केंद्र सरकार ने अग्निवीरों के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चार साल की सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों के लिए दो साल का अतिरिक्त कार्यकाल देने की व्यवस्था को मंजूरी दी है। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है, जब पहले बैच के करीब 24,400 अग्निवीर अपनी चार साल की सेवा पूरी करने के करीब थे। पुरानी व्यवस्था के तहत इनमें से 75 प्रतिशत यानी करीब 18,300 जवानों को सेवा से बाहर होना था। अब इन अग्निवीरों को दो साल और सेवा करने का मौका मिलेगा। नौसेना के पहले बैच की सेवा 21 नवंबर, वायु सेना की 25 दिसंबर और थल सेना की 31 दिसंबर को पूरी होने वाली थी।
अग्निपथ योजना में अब क्या बदला?
पहले अग्निवीरों की सेवा अवधि चार साल तय थी। इस दौरान करीब छह महीने का प्रशिक्षण और साढ़े तीन साल की वास्तविक सेवा शामिल थी। चार साल पूरे होने पर अधिकतम 25 प्रतिशत अग्निवीरों को प्रदर्शन और चयन के आधार पर नियमित कैडर में शामिल किया जाना था। बाकी 75 प्रतिशत को सेवा निधि पैकेज देकर वापस नागरिक जीवन में लौटना पड़ता था। नई व्यवस्था में इन 75 प्रतिशत अग्निवीरों को दो साल का अतिरिक्त कार्यकाल मिलेगा। इस तरह वे कुल छह साल तक सेवा कर सकेंगे। इसके बाद उन्हें नियमित सैनिक बनने का एक और मौका मिलेगा। हालांकि, यह नियुक्ति अपने आप नहीं होगी। इसके लिए अग्निवीर की इच्छा और सेना के तय चयन मानदंड जरूरी होंगे।

अतिरिक्त दो साल में कितनी मिलेगी सैलरी?
नई व्यवस्था में अतिरिक्त कार्यकाल के दौरान अग्निवीरों को पहले से ज्यादा वेतन मिलेगा। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि की ब्रीफिंग के मुताबिक, दूसरे चरण के पहले साल में उन्हें 43,500 रुपये और दूसरे साल में 47,500 रुपये वेतन दिया जाएगा। सेवा निधि पैकेज में भी सरकार का योगदान बढ़ाया जाएगा। पहले सरकार अग्निवीर के योगदान के बराबर 30 प्रतिशत राशि देती थी, लेकिन अतिरिक्त दो साल की अवधि में यह योगदान बढ़कर 70 प्रतिशत हो जाएगा। इसके अलावा वरिष्ठता से जुड़े लाभ भी मिलेंगे। हालांकि, दो साल बाद नियमित कैडर में शामिल होने वाले अग्निवीरों की वरिष्ठता पहले चरण में मेरिट के आधार पर चुने गए 25 प्रतिशत जवानों से कम होगी।

क्या नियमित सैनिक बनने का रास्ता आसान हुआ?
अतिरिक्त दो साल मिलने का मतलब यह नहीं है कि सभी अग्निवीरों को स्थायी नौकरी मिल जाएगी। नियमित कैडर में शामिल करने का अधिकतम 25 प्रतिशत वाला पुराना प्रावधान जारी रहेगा। नए बदलाव के तहत बाकी अग्निवीरों को भी दो साल का अतिरिक्त अनुभव हासिल करने और चयन प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर मिलेगा। अंतिम फैसला उनकी इच्छा और सशस्त्र बलों के चयन मानदंडों के आधार पर होगा। यानी सेवा की अवधि बढ़ी है, लेकिन स्थायी भर्ती की गारंटी नहीं दी गई है। मूल भर्ती ढांचे में भी कोई बदलाव नहीं किया गया है। बदलाव मुख्य रूप से उन 75 प्रतिशत अग्निवीरों के सेवा से बाहर होने के रास्ते में किया गया है, जिन्हें पहले चार साल बाद ही लौटना पड़ता था।

क्यों शुरू की गई थी अग्निपथ योजना?
अग्निपथ योजना की घोषणा 14 जून 2022 को हुई थी। इसके तहत थल सेना, नौसेना और वायु सेना में ऑफिसर रैंक से नीचे के पदों पर भर्ती शुरू की गई। शुरुआत में 17.5 से 21 साल की उम्र के पुरुष और महिलाएं आवेदन कर सकते थे। साल में दो बार भर्ती की व्यवस्था बनाई गई। योजना लागू होने के समय सरकार का मकसद सेना की औसत उम्र कम करना, ज्यादा युवा सैनिकों को शामिल करना और वेतन-पेंशन पर बढ़ते खर्च को नियंत्रित करना था।

    रक्षा मंत्रालय का अनुमान था कि इस व्यवस्था से सशस्त्र बलों की औसत उम्र 32 साल से घटकर 24 से 26 साल तक आ सकती है। सरकार ने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इजरायल, रूस और चीन की सेनाओं का उदाहरण भी दिया था, जहां सैनिकों की औसत उम्र करीब 26 से 27 साल बताई गई थी।

रक्षा बजट और पेंशन का बोझ भी था वजह
अग्निपथ योजना लागू होने के पीछे रक्षा खर्च का बढ़ता दबाव भी एक बड़ी वजह था। पिछले एक दशक में रक्षा कर्मियों के वेतन, भत्तों और पेंशन पर खर्च लगातार बढ़ा था। रक्षा मंत्रालय के कुल खर्च में इन मदों की हिस्सेदारी करीब 55 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। वहीं, सैन्य उपकरणों की खरीद और रखरखाव के लिए उपलब्ध हिस्से में 4 प्रतिशत की कमी आई थी। अनुसंधान और विकास पर भी कुल खर्च का करीब 3 से 4 प्रतिशत ही लगाया जा रहा था।

    वित्त वर्ष 2022-23 में वेतन, भत्तों और पेंशन पर 2,87,040 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जो मंत्रालय के राजस्व व्यय का 79 प्रतिशत था। पेंशन का बढ़ता बोझ वेतन संशोधन और वन रैंक वन पेंशन यानी OROP लागू होने से भी जुड़ा था। सरकार चाहती थी कि कम अवधि की सेवा के जरिए सेना के लंबे समय तक चलने वाले वेतन और पेंशन खर्च को कम किया जाए।

योजना के खिलाफ क्यों हुआ था विरोध?
अग्निपथ योजना की घोषणा के बाद देश के कई राज्यों में बड़े विरोध-प्रदर्शन हुए थे। सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं ने चार साल की सेवा अवधि और स्थायी नौकरी के सीमित अवसरों पर सवाल उठाए। नौकरी की सुरक्षा नहीं होने, 21 साल की ऊपरी आयु सीमा और कोविड के दौरान भर्ती प्रक्रिया में हुई देरी ने भी नाराजगी बढ़ाई। कई जगह प्रदर्शन हिंसक हो गए। ट्रेनों और बसों को आग लगाई गई, राजमार्ग जाम किए गए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा।

    कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दलों ने भी योजना वापस लेने की मांग की। विपक्ष ने सैन्य करियर, ऑपरेशनल तैयारी, यूनिट के आपसी तालमेल और भर्ती प्रक्रिया पर इसके संभावित असर को लेकर सवाल उठाए।

    विरोध के बाद केंद्र ने 2022 की भर्ती के लिए ऊपरी आयु सीमा में एक बार की छूट देते हुए इसे 23 साल कर दिया था। इसके अलावा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और असम राइफल्स में पूर्व अग्निवीरों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गई।

    कई भाजपा शासित राज्यों ने पुलिस सेवाओं में भी उन्हें प्राथमिकता देने की बात कही थी। निजी कंपनियों ने भी चार साल की सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों को रोजगार देने में रुचि दिखाई थी।

सेना की समीक्षा में क्या सामने आया?
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि (CDS) के मुताबिक, सशस्त्र बलों की समीक्षा में अग्निवीरों का प्रदर्शन कई क्षेत्रों में अच्छा पाया गया। उनकी शारीरिक फिटनेस, प्रेरणा, अनुशासन, तकनीकी समझ और कौशल को सकारात्मक बताया गया। समीक्षा में यह भी सामने आया कि भर्ती का दायरा देशभर में बढ़ा है और चयन प्रक्रिया पहले से ज्यादा पारदर्शी और एक जैसी हुई है। अब चयन प्रक्रिया में शारीरिक परीक्षा से पहले लिखित परीक्षा आयोजित की जाती है। महिला अग्निवीरों के लिए भी अवसर बढ़ाने की बात कही गई है। जनरल सुब्रमणि ने बताया कि करीब 25 से 30 प्रतिशत अग्निवीर पहले से ही ऑपरेशनल क्षेत्रों में तैनात हैं और सक्रिय सैन्य जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।

क्या यूनिट के तालमेल पर असर पड़ेगा?
अग्निपथ योजना को लेकर एक बड़ी चिंता यह रही है कि कम अवधि की सेवा के कारण सैनिकों के बीच आपसी तालमेल और अनुभव पर असर पड़ सकता है। प्रशिक्षित जवानों के लगातार बाहर होने से सेना को अनुभवी कर्मियों की उपलब्धता बनाए रखने में चुनौती आने की आशंका भी जताई गई थी। सशस्त्र बलों ने अपनी समीक्षा के बाद सरकार को संगठनात्मक जरूरतों और ऑपरेशनल दक्षता के आधार पर सुझाव दिए। सरकार का मानना है कि दो साल का अतिरिक्त कार्यकाल इस चिंता को दूर करने में मदद करेगा और यूनिट के तालमेल पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।

    कुल मिलाकर, अग्निपथ योजना के मूल ढांचे को बरकरार रखते हुए सरकार ने चार साल बाद बाहर होने वाले अग्निवीरों को दो साल का अतिरिक्त अवसर दिया है। इससे उन्हें ज्यादा अनुभव, बेहतर वेतन और नियमित सैनिक बनने का एक और मौका मिलेगा। लेकिन स्थायी सेवा का रास्ता अब भी चयन पर निर्भर करेगा। इस बदलाव की असली परीक्षा आने वाले समय में होगी, जब सेना में इन अग्निवीरों के प्रदर्शन और नई व्यवस्था के असर का आकलन किया जाएगा।