नई दिल्ली
जहां विकसित देश अमरीकी बॉन्ड और डॉलर को सुरक्षित ठिकाना मानते हैं, वहीं ब्रिक्स समेत उभरते देश अपनी वित्तीय स्वतंत्रता की नई राह पर आगे बढ़ रहे हैं। अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच विकसित देश अमरीकी सरकारी बॉन्ड्स और डॉलर खरीदते रहे। जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन इनमें पूंजी लगा रहे हैं। वहीं, भारत, चीन और ब्राजील जैसे ब्रिक्स देश इनसे दूरी बना रहे हैं। पिछले एक साल में भारत, चीन और ब्राजील ने अमरीकी बॉन्ड में निवेश 183 अरब डॉलर घटाया है।
हर अमेरिकी पर 1 लाख डॉलर का कर्ज
अमेरिकी कर्ज का जाल हाथ से निकल गया है। आहूजा का लिंक्डइन पोस्ट को लेकर वित्तीय हलकों में बहस छिड़ी हुई है। उन्होंने सीधे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है-अमेरिका पर यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की कुल जीडीपी से भी ज्यादा कर्ज है। यह हर अमेरिकी पर एक लाख डॉलर से ज्यादा का कर्ज है। यह चेतावनी IMF की ओर से अमेरिका के 36 ट्रिलियन डॉलर के संघीय कर्ज पर हालिया आंकड़े के बाद आई है।
IMF ने किस बात पर जताई है गंभीर चिंता
आईएमएफ ने बीते साल अमेरिका के 36 ट्रिलियन डॉलर के संघीय ऋण पर चिंता जताई थी। यह कर्ज मुख्य रूप से 2008 के बाद के वित्तीय सहायता पैकेजों, रिकॉर्ड रक्षा खर्च और महामारी के दौरान दिए गए प्रोत्साहन पैकेजों के कारण बढ़ा है। अब अमेरिका के सबसे बड़े ऋणदाता अपना पैसा वापस चाहते हैं। चीन, जापान, ब्रिटेन और कनाडा ने चुपचाप अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड बेचना शुरू कर दिया है। निवेशकों को बनाए रखने के लिए अमेरिका ब्याज दरें बढ़ा रहा है। लेकिन इससे संकट और गहरा रहा है। वार्षिक ब्याज भुगतान अब 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया है, जो पेंटागन के बजट से भी अधिक है
दुनिया के कारोबार पर डॉलर का रहा है राज
दशकों से अमेरिकी डॉलर ने दुनिया की अग्रणी आरक्षित मुद्रा के रूप में राज किया है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अनुसार, 1999 से 2019 के बीच अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 96 प्रतिशत, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 74 प्रतिशत और बाकी दुनिया में 79 प्रतिशत डॉलर का उपयोग किया गया था। अटलांटिक काउंसिल के अनुसार, अमेरिकी डॉलर का उपयोग लगभग 88 प्रतिशत मुद्रा विनिमय में किया जाता है और केंद्रीय बैंकों के रखे गए सभी विदेशी मुद्रा भंडार का 59 प्रतिशत उपयोग डॉलर में किया जाता है।
भारत-रूस में 90 फीसदी कारोबार में गैर डॉलर मुद्रा में
नवभारत टाइम्स के एक लेख के मुताबिक, रूस के उप-प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने नवंबर, 2024 में कहा था कि भारत और रूस के बीच लगभग 90% व्यापार अब स्थानीय या वैकल्पिक मुद्राओं के माध्यम से हो रहा है, जबकि शेष व्यापार अभी भी अन्य मुक्त रूप से परिवर्तनीय मुद्राओं में होता है। यानी इस कारोबार में डॉलर का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। उन्होंने दिल्ली में व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग पर भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग के 25वें सत्र में अपने उद्घाटन भाषण में कहा-द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय और वैकल्पिक मुद्राओं की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। यह अब 90% के करीब पहुंच रही है। हम रूसी और भारतीय बैंकों के बीच संवाददाता संबंधों के विस्तार पर अपना काम जारी रखना आवश्यक समझते हैं।
भारत ने कर दी थी बड़ी पहल, ब्रिक्स होगा मजबूत
भारत ने स्थानीय मुद्रा में व्यापार निपटान को सक्षम बनाने की दिशा में पहला कदम तब उठाया, जब जुलाई 2022 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार लेनदेन के चालान और भुगतान को रुपये में अनुमति दे दी। यह कदम यूक्रेन युद्ध की शुरुआत और अंतर्राष्ट्रीय भुगतान एवं निपटान प्रणालियों से रूस को बाहर करने के बाद उठाया गया था। भारत में लगभग 20 प्राधिकृत डीलर (एडी) बैंकों को इस व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए 22 से अधिक देशों के साझेदार बैंकों के 92 विशेष रुपया वास्ट्रो खाते खोलने की अनुमति दी गई है। भारत के ब्रिक्स का अध्यक्ष बनने के बाद से इससमें और तेजी आ सकती है।
भारतीय एक्सपर्ट ने भी बता दी हकीकत
बीते साल जाने-माने एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मचेलानी ने सोशल मीडिया एक्स पर कहा था कि प्रतिद्वंद्वी गुटों में बंटती दुनिया में पुतिन की 4-5 दिसंबर की नई दिल्ली यात्रा सिर्फ एक और कूटनीतिक पड़ाव नहीं है। यह एक शक्तिशाली भू-राजनीतिक बयान है। इस यात्रा से महत्वपूर्ण समझौते होने की संभावना है, जिनमें स्विफ्ट प्रणाली को दरकिनार करने और अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करने के लिए डिजाइन किए गए नए भुगतान चैनल शामिल हैं।…भारत अपना एक स्पष्ट संदेश दे रहा है।
ब्रिक्स मुद्रा के क्या फायदे हो सकते हैं
एक नई मुद्रा से ब्रिक्स देशों को कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें अधिक कुशल सीमा-पार लेनदेन और बेहतर वित्तीय समावेशन शामिल हैं। ब्लॉकचेन तकनीक, डिजिटल मुद्राओं और स्मार्ट अनुबंधों का लाभ उठाकर, यह मुद्रा वैश्विक वित्तीय प्रणाली में क्रांति ला सकती है। निर्बाध सीमा-पार भुगतानों के माध्यम से, यह ब्रिक्स देशों और अन्य देशों के बीच व्यापार और आर्थिक एकीकरण को भी बढ़ावा दे सकती है।
पुतिन ने डॉलर से अलग मुद्रा की बात की
बीते साल रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कजान के मंच से कहा था-हम डॉलर से इनकार नहीं कर रहे हैं, उससे लड़ नहीं रहे हैं, लेकिन अगर वे हमें इसके साथ काम करने नहीं देंगे, तो हम क्या कर सकते हैं? हमें तब अन्य विकल्पों की तलाश करनी होगी, जो हो भी रहा है। एक संभावित ब्रिक्स मुद्रा इन देशों को मौजूदा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए अपनी आर्थिक स्वतंत्रता का दावा करने में सक्षम बनाएगी। वर्तमान प्रणाली में अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व है, जो सभी मुद्रा व्यापार का लगभग 89 प्रतिशत है। परंपरागत रूप से, लगभग 100 प्रतिशत तेल व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता था। हालांकि, 2023 में तेल व्यापार का पांचवां हिस्सा गैर-अमेरिकी डॉलर मुद्राओं का उपयोग करके किया गया।
ब्रिक्स देश इसलिए चाहते हैं डॉलर के मुकाबले नई मुद्रा
ब्रिक्स देशों के समक्ष हाल की वैश्विक वित्तीय चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। आक्रामक अमेरिकी विदेश नीतियां भी इसके पीछे बड़ी वजह हैं। अपने आर्थिक हितों को बेहतर ढंग से पूरा करने का मकसद है। अमेरिकी डॉलर और यूरो पर वैश्विक निर्भरता कम करने का लक्ष्य है। अमेरिका-यूरोप की पाबंदियों के असर को कम करना भी मकसद है।
दिनेश मिश्र
घटाए जा रहे अमेरिकी बॉन्ड्स
भारत के पास अक्टूबर 2025 में 190.7 अरब डॉलर मूल्य के अमरीकी बॉन्ड्स थे। जबकि अक्टूबर 2024 में यह आंकड़ा 241.4 अरब डॉलर का था। इस तरह इसमें 40 फीसदी की भारी गिरावट आई है। ग्लोबल फॉरेक्स रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी गिरी है। 5 साल में ही इसमें 18 फीसदी की गिरावट आई है।
वैश्विक आर्थिक संतुलन बदल रहा
भारत ने 4 साल में पहली बार यूएस ट्रेजरी में हिस्सेदारी घटाई है। जबकि इस दौरान अमरीकी बॉन्ड यील्ड 4.8% तक रहा, जो काफी ज्यादा रिटर्न है। यह संकेत देता है कि अब वैश्विक आर्थिक संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है। भारत की नीति साफ है- डॉलर पर निर्भरता घटाकर एक मजबूत, विविध और संतुलित विदेशी भंडार प्रणाली बनाना । ब्रिक्स देशों की यह रणनीति अमरीकी डॉलर पर निर्भरता घटाने यानी डीडॉलराइजेशन की ओर एक ठोस कदम है। भारत अपनी विदेशी मुद्रा डॉलर के साथ सोना, यूरो व एशियाई बॉन्ड्स में रख रहा है।

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