लखनऊ
भारतीय उच्च शिक्षा और सार्वजनिक भर्ती प्रक्रियाओं का पूरा ढांचा इस समय एक बेहद संवेदनशील, जटिल और निर्णयात्मक मोड़ पर खड़ा है। देश भर में एक के बाद एक सामने आ रही धांधलियों ने न केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की पवित्रता को धूमिल किया है, बल्कि करोड़ों युवाओं के मन में संपूर्ण व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास भी पैदा कर दिया है।
हाल के दिनों में पंजाब में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक होने और कर्नाटक में कनिष्ठ अभियंताओं व शिक्षक भर्तियों में उजागर हुए संगठित घोटालों जैसी प्रांतीय घटनाओं से लेकर नीट (NEET) जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित परीक्षाओं में आई गड़बड़ियों ने अभ्यर्थियों के आक्रोश को सड़कों पर ला दिया है। जंतर-मंतर से लेकर विभिन्न राज्यों के प्रशासनिक मुख्यालयों तक युवाओं का यह लगातार हो रहा उद्वेलन केवल एक तात्कालिक विरोध-प्रदर्शन मात्र नहीं, बल्कि उस समूची कार्यप्रणाली पर उठता हुआ एक यक्ष प्रश्न है, जो हर बार लचर सुरक्षा व्यवस्था के कारण लाखों मेधावी छात्रों के वर्षों के कठिन परिश्रम और भविष्य को अनिश्चितता के भंवर में धकेल देती है।
इस घोर निराशाजनक और उथल-पुथल भरे राष्ट्रीय परिदृश्य के बीच, उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक इच्छाशक्ति, कड़े नियंत्रण और संस्थागत सुधारों के जो धरातलीय नतीजे सामने आए हैं, वे पूरे देश के लिए एक अनुकरणीय और व्यावहारिक राह दिखाते हैं। प्रदेश में पिछले पांच वर्षों से लगातार अधर में लटकी टीजीटी और पीजीटी जैसी वृहद व जटिल भर्ती परीक्षाओं का पूरी तरह से पारदर्शी, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण निष्पादन होना कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी।
यह सफलता दशकों से राज्य की परीक्षा प्रणाली में अपनी गहरी जड़ें जमा चुके परीक्षा माफियाओं, साल्वर गैंग और नकल सिंडिकेट के संगठित ढांचे पर एक सीधा, योजनाबद्ध और करारा प्रहार थी।
उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष डॉ. प्रशांत कुमार के कुशल मार्गदर्शन, दूरदर्शी नेतृत्व और कठोर प्रशासनिक दृष्टि के तहत अपनाई गई व्यापक रणनीति ने राज्य की पंगु हो चुकी परीक्षा व्यवस्था में एक नया जीवन फूंकने का काम किया। इस सुदृढ़ और अभेद्य सुधारात्मक प्रक्रिया को मुख्य रूप से तीन मजबूत स्तंभों पर खड़ा किया गया। पहला, आधुनिक तकनीक के सटीक समावेशन से प्रश्नपत्रों के निर्माण, मुद्रण से लेकर वितरण तक को जीपीएस ट्रैकिंग, एनक्रिप्टेड डिजिटल लॉकर व बारकोडिंग जैसे डिजिटल सुरक्षा घेरे में लाना। दूसरा, गोपनीय प्रक्रियाओं के कड़े क्रियान्वयन, कमांड सेंटरों, बायोमेट्रिक मिलान व लाइव सीसीटीवी सर्विलांस से युक्त त्रिस्तरीय निगरानी प्रणाली और तीसरा, बिना किसी सिफारिश या धनबल के केवल मेहनत व योग्यता के दम पर सफलता सुनिश्चित करके अभ्यर्थियों के मन में पारदर्शिता और जन-विश्वास की पुनर्बहाली करना।
इसी पारदर्शी और मजबूत व्यवस्था की बदौलत पांच वर्षों से लटकी असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा भी अपनी लिखित प्रक्रिया को निष्पक्षता से पार करते हुए अपने अंतिम मुकाम यानी साक्षात्कार के चरण तक सफलतापूर्वक पहुंच सकी थी।
हालांकि, जब यह ऐतिहासिक सुधारात्मक बदलाव अपने अंतिम और तार्किक मुकाम की ओर बढ़ रहा था तथा अभ्यर्थियों में नियुक्तियों की उम्मीद जग रही थी, ठीक उसी मोड़ पर असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती के साक्षात्कारों पर उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश का आ जाना एक नई प्रशासनिक, सामाजिक और न्यायिक चिंता को जन्म देता है। इस पूरे घटनाक्रम में विचारणीय पहलू यह रहा कि गनीमत यह रही कि नीट की रद्द परीक्षा के संदर्भ में पेपर लीक गैंग की तरफ से कोई शीर्ष अदालत नहीं पहुंचा, अन्यथा वह पुनर्परीक्षा भी अनिश्चितकाल के लिए कानूनी दांव-पेचों की खटाई में पड़ जाती।
एक ऐसे संवेदनशील समय में जब देश भर में पेपर लीक के कारण परीक्षा तंत्र की साख पर संकट छाया हुआ है, उत्तर प्रदेश में बड़ी मुश्किलों के बाद पटरी पर लौटी एक पारदर्शी प्रक्रिया का पुनः कानूनी याचिकाओं के जाल में उलझ जाना सीधे तौर पर ईमानदार अभ्यर्थियों के धैर्य की कठिन परीक्षा लेता है।
प्रशासनिक धरातल पर हमेशा से यह देखा गया है कि जब भी किसी सड़ी-गली व्यवस्था में शुद्धता लाने के गंभीर प्रयास शुरू होते हैं, तब निहित स्वार्थों से प्रेरित तत्व और परीक्षा माफिया शांत होकर नहीं बैठते। जब तकनीकी और प्रशासनिक मोर्चे पर उनकी सेंधमारी के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब वे कानून के बारीक छिद्रों या प्रक्रियात्मक त्रुटियों का सहारा लेकर पूरी भर्ती प्रक्रिया को ठप कराने में जुट जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस हालिया स्थगन आदेश को भी अभ्यर्थियों और विश्लेषकों द्वारा इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है
आज जब देश के कई प्रमुख राज्य अपनी परीक्षा प्रणाली की ध्वस्त हो चुकी साख को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं, तब तकनीक, कड़े प्रशासनिक नियमों और मजबूत संकल्प के आधार पर निर्मित उत्तर प्रदेश का यह सुधारात्मक मॉडल एक प्रभावी मार्गदर्शक और व्यावहारिक समाधान सिद्ध होता है। इस व्यावहारिक समाधान की प्रभावशीलता को भविष्य में भी बनाए रखने के लिए अब कुछ ठोस विधिक और संस्थागत कदमों पर गंभीरता से विचार करना अत्यंत अनिवार्य हो जाता है।
इन ठोस कदमों की पहली और सबसे महत्वपूर्ण दिशा प्रशासनिक निर्णयों को एक अभेद्य 'कानूनी सुरक्षा घेरा' प्रदान करने की है, ताकि निहित स्वार्थों से संचालित तत्व अदालती प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करके पारदर्शी भर्तियों को अटका न सकें। इस दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के साथ-साथ भर्ती से जुड़े मामलों के लिए विशेष न्यायिक पीठों के माध्यम से Fast-track hearing करना होगा, जिससे स्थगन आदेश महीनों और सालों तक युवाओं के भविष्य को अधर में न लटकाए रखें।
इसके साथ ही, व्यवस्था में 'सुधारों की निरंतरता' को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए डॉ. प्रशांत कुमार जैसे दृढ़ इच्छाशक्ति वाले प्रशासकों द्वारा स्थापित पारदर्शी मानकों को स्थायी शासकीय नीति का अंग बनाना होगा, ताकि भविष्य में नेतृत्व बदलने के बावजूद परीक्षाओं की स्वच्छता और शुचिता पर कोई आंच न आ सके।
समय की मांग है कि तकनीक और निष्पक्षता लाने वाले ऐसे प्रशासनिक सुधारों को हर स्तर पर संस्थागत संबल और संरक्षण मिले। जब हर कदम पर पूरी तैयारी होगी, हर दावे के पीछे ठोस तथ्य होंगे और नीयत साफ होगी, तभी व्यवस्था पर देश के करोड़ों युवाओं का अटूट भरोसा बन सकेगा और जब यह भरोसा सुदृढ़ होगा, तभी मेधा की विजय सुनिश्चित होगी तथा परीक्षा माफियाओं के हर षड्यंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकने की इस सुधारात्मक यात्रा को बिना रुके निरंतर आगे बढ़ाया जा सकेगा।

More Stories
लखनऊ सिविल कोर्ट हमला: आरोपी वकीलों की तलाश तेज, 10 पुलिस टीमें कर रहीं छापेमारी
कांवड़ यात्रा को लेकर दिल्ली में ट्रैफिक प्लान जारी, कई रास्तों पर प्रतिबंध
राजस्थान में मिड डे मील घोटाले का बड़ा खुलासा, बच्चों का दूध मावा भट्टियों तक पहुंचाने का आरोप