एक मोटी सैलरी वाला पैकेज, नामी कंपनी का टैग और साथ देने वाली टीम… आमतौर पर किसी भी नौकरीपेशा इंसान के लिए यह एक परफेक्ट 'करियर सेफ्टी नेट' (सुरक्षा कवच) जैसा लगता है. लेकिन कॉर्पोरेट की दुनिया में कब, क्या और कैसे बदल जाए, कोई नहीं जानता. बेंगलुरु के एक टेक प्रोफेशनल के साथ जो हुआ, उसने इस भरोसे को रातों-रात तोड़कर रख दिया है.
₹35 लाख (LPA) का सालाना पैकेज पाने वाले एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की अचानक हुई छंटनी (ले-ऑफ) ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कॉर्पोरेट में आपकी वफादारी और परफॉर्मेंस कभी भी आपकी जॉब सिक्योरिटी की परमानेंट गारंटी नहीं हो सकती.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर आयशा नाम की एक टेक प्रोफेशनल ने अपने अंकल की यह कहानी साझा की है, जो इन दिनों इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रही है और कॉर्पोरेट कल्चर पर एक नई बहस छेड़ चुकी है.
रात-रात भर काम, वीकेंड पर भी ड्यूटी… और फिर!
आयशा ने बताया कि उनके अंकल पिछले साल ही ₹35 लाख के बड़े पैकेज पर एक सॉफ्टवेयर जॉब के लिए बेंगलुरु शिफ्ट हुए थे. कागज पर सब कुछ एकदम परफेक्ट था, ऑफिस का माहौल बेहतरीन था और टीम के लोग भी काफी सपोर्टिव थे. लेकिन इस शानदार पैकेज के बदले उन्हें अपनी नींद और सुकून की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही थी. वे देर रात तक होने वाले कोड डिप्लॉयमेंट में लगे रहते थे, वीकेंड (शनिवार-रविवार) पर भी काम करते थे और बहुत कम सो पाते थे.
फिर एक आम सुबह, सब कुछ अचानक ठहर गया. आयशा के मुताबिक, उनके अंकल के पास एचआर (HR) का एक फोन आया. यह कॉल सिर्फ 14 मिनट चली. बातचीत खत्म होने से पहले ही उनके ऑफिशियल लैपटॉप का एक्सेस पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया और पलक झपकते ही उनकी नौकरी का अचानक अंत हो गया.
छंटनी के बाद मिले 3 सबसे बड़े सबक
इस झटके से उबरने के बाद आयशा के अंकल ने जो बातें सीखीं, वो आज के हर युवा और वर्कर के लिए जानना बेहद जरूरी है:
यह आपके परफॉर्मेंस की कमी नहीं है: उन्होंने महसूस किया कि इस छंटनी का उनके काम या परफॉर्मेंस से कोई लेना-देना नहीं था. यह पूरी तरह से कंपनी के बदलते बिजनेस नंबर्स और बजट फैसलों का नतीजा था. आपका मैनेजर चाहे आपको कितना भी पसंद क्यों न करता हो, कंपनी की वित्तीय मजबूरियों और प्राथमिकताओं के आगे सब बेबस हो जाते हैं.
नौकरी का मतलब स्थिरता नहीं होता: आयशा लिखती हैं कि उनके अंकल की एक बात उनके दिल में बैठ गई, उन्होंने कहा था कि मुझे लगता था कि नौकरी का मतलब स्थिरता होता है. लेकिन इस वाकये ने उनका नजरिया बदल दिया. अब वे नौकरी को एक 'शॉर्ट-टर्म अपॉर्चुनिटी' (अस्थायी मौका) की तरह देखते हैं, न कि कोई परमानेंट गारंटी.
नेटवर्किंग ही असली संपत्ति है: इस मुश्किल घड़ी में जिस चीज ने उनकी सबसे ज्यादा मदद की, वो था उनका 'प्रोफेशनल नेटवर्क'. जिन लोगों से उन्होंने सालों से अच्छे संबंध बनाए रखे थे, संकट के समय उन्हीं लोगों ने उन्हें नए मौकों और जॉब्स के ऑफर दिए.
2 दिन के भीतर दोबारा शुरुआत
कंपनी की तरफ से उन्हें सेवरेंस पे के रूप में 4 महीने की सैलरी तो मिली, लेकिन उन्होंने इसे आराम करने का जरिया नहीं बनाया. नौकरी जाने के महज दो दिनों के भीतर ही उन्होंने पूरी ताकत के साथ नए जॉब्स के लिए अप्लाई करना शुरू कर दिया.

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